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विवाह संबंधी लग्न विचार, विवाह मुहूर्त निकालने के तरीके

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शादी विवाह को व्यक्ति के जीवन का सबसे अहम और महत्वपूर्ण फैसला माना जाता है इसलिए इससे जुड़े हर कार्य को करने से पूर्व शुभ मुहूर्त निकाल लेना आवश्यक होता है। क्योंकि शुभ मुहूर्त में किया गया विवाह न केवल वर वधु के जीवन को बेहतर बनाता है अपितु उनके संबंधो और उनके मध्य प्यार को बनाए रखने में भी मदद करता है।

माना जाता है यदि वर-कन्या विवाह शुभ मुहूर्त में न किया जाए तो वह शादी ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाती और दम्पत्ति में प्रायः कलेश होता रहता है। इसीलिए शादी का मुहूर्त पूरी सवधानी और सजगता के साथ निकालना चाहिए। यहाँ हम आपको विवाह किस मुहूर्त में करें और उस मुहूर्त की गणना किस प्रकार करें इस बारे में बता रहे है।

कौन से नक्षत्र में विवाह करें?

विवाह संस्कार को व्यक्ति के जीवन के महत्वपूर्ण सोलह संस्कारों में से एक माना जाता है। इसलिए विवाह मुहूर्त की गणना करते समय प्रत्येक तथ्य को बारीकी से जांचना होगा। इसके लिए शुभ मुहूर्त का होना भी अति आवश्यक है। ऐसे तो हिन्दू पंचांग में कुल 27 नक्षत्र है परंतु उनमे से केवल कुछ हो ही विवाह आदि के लिए शुभ माना जाता है। वे नक्षत्र है – मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा आषाढ़, उत्तरा भाद्रपद, स्वाति, मघा और रोहिणी।

कौन से माह में विवाह करें?

शुभ नक्षत्र के साथ-साथ विवाह के लिए शुभ माह का होना भी बहुत जरुरी होता है। भले ही साल में 12 महीने आते होंगे लेकिन उनमे केवल कुछ ही महीनों में विवाह उपयुक्त माने जाते है। पंचांग के मुताबिक – ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष और आषाढ़ माह में विवाह करना शुभ माना जाता है।

हिन्दू धर्म में शादी का मुहूर्त कैसे निकाला जाता है?विवाह मुहूर्त

हिन्दू विवाह में कन्या के लिए गुरुबल जबकि वर के लिए सूर्यबल पर विचार करना चाहिए। और दोनों के लिए चंद्रबल पर विचार करना चाहिए। प्रत्येक पंचांग में विवाह मुहूर्त पहले से ही लिखे होते है जिनमे शुभ सूचक खड़ी रेखाएं और अशुभ सूचक टेढ़ी रेखाएं होती है। ज्योतिष में कुल दस दोष बताए जाते है, जिस विवाह के मुहूर्त में जितने दोष नहीं होते है, उतनी ही खड़ी रेखाएं होती हैं और दोष सूचक टेढ़ी रेखाएं मानी जाती हैं। सर्वश्रेठ मुहूर्त दस रेखाओं का होता है। जबकि मध्यम सात से आठ रेखाओं का होता है और जघन्य पांच रेखाओं का होता है। और इससे कम रेखाओं के मुहूर्त को निन्द्य कहा जाता है।

विवाह के लिए गुरुबल विचार :-

कन्या की राशि में बृहस्पति यदि नवम, पंचम, एकादश, द्वितीया और सप्तम भाव में हो तो शुभ माना जाता है। इसके अलावा बृहस्पति के दशम, तृतीया, षष्ठ और प्रथम भाव में होने पर दान देना शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भाव में अशुभ होता है।

विवाह में सूर्यबल विचार :-

वर की राशि में सूर्य यदि तृतीय, षष्ठ, दशम, एकादश भाव में हो तो शुभ माना जाता है। इसके अलावा सूर्य के प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम और नवम भाव में होने पर दान देना शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भाव में अशुभ होता है।

विवाह में चंद्रबल विचार :-

चंद्रबल, वर और कन्या दोनों की ही कुंडली में देखा जाता है। पंचांग के अनुसार चंद्रमा वर और कन्या की राशि में तीसरे, छठे, सातवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ मना जाता है। इसके अलावा चंद्रमा यदि पहले, दुसरे, पांचवें और नौवें भाव में हो तो दान देना शुभ माना जाता है और चौथे, आठवें, बाहरवें भाव में अशुभ होता है।

विवाह में अन्धादि लग्न और उनका फल :-

दिन में तुला और वृश्चिक, रात्रि में तुला और मकर बधिर है। तथा दिन में सिंह, मेष, वृष और रात्रि में कन्या, मिथुन, कर्क अंध संज्ञक हैं। दिन में कुम्भ और रात्रि में मीन लग्न पंगु होते है। कुछ ज्योतिषियों के अनुसार धनु, तुला, वृश्चिक, ये तीनो अपराह्न में बधिर हैं, जबकि मिथुन, कर्क व् कन्या ये लग्न रात्रि में अंधे होते है। सिंह, मेष, वृष ये लग्न दिन में अंधे होते है और मकर, कुम्भ, मीन प्रातःकाल तथा सायंकाल में कुबड़े होते है।

यदि विवाह बधिर लग्न में हो तो वर-कन्या दरिद्र हो जाते है, यदि दिवान्ध में लग्न हो तो कन्या विधवा हो जाती है, यदि रात्रान्ध में लग्न हो तो सन्तति मरण और पंगु में लग्न हो तो धन नाश होता है।

विवाह के शुभ लग्न :-

विवाह के लिए शुभ लग्न तुला, मिथुन, कन्या, वृष और धनु माने जाते है। जबकि अन्य सभी लग्न मध्यम माने जाते है।